काशीपुर-जसपुर मार्ग पर स्थित जगतपुर पट्टी टोल प्लाजा पर देर रात जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसान यूनियन का झंडा हाथ में लेते ही देश के नियम-कानून बौने हो जाते हैं? बीती रात कुछ तथाकथित किसान नेताओं ने अपनी जिद और रसूख के आगे न केवल नेशनल हाईवे के नियमों को ताक पर रखा, बल्कि अपनी ड्यूटी कर रहे टोल मैनेजर और कर्मचारियों को भी प्रताड़ित किया। असल में, एनएचएआई (NHAI) की नियमावली में स्पष्ट है कि टोल फ्री की श्रेणी में संवैधानिक पद, सेना और आपातकालीन सेवाएं आती हैं, न कि कोई यूनियन। बावजूद इसके, खुद को कानून से ऊपर समझने वाले कुछ चेहरे आए दिन टोल पर पहुँचकर हंगामा करते हैं और प्रबंधकों पर अवैध दबाव बनाकर टोल फ्री करवाते हैं। देर रात का घटनाक्रम भी इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा था, जहाँ अपना काम ईमानदारी से करने वाले टोल मैनेजर के खिलाफ ही कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया गया। यह सोचना बेहद जरूरी है कि एक कर्मचारी, जो केवल सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का पालन कर रहा है, उसकी क्या गलती है? क्या वर्दी या संगठन के झंडे की आड़ में किसी के वैध कारोबार और व्यवस्था को नुकसान पहुँचाना जायज है? ‘अन्नदाता’ जैसे पवित्र शब्द की आड़ लेकर कुछ चुनिंदा चेहरे जिस तरह की अराजकता फैला रहे हैं, उससे न केवल राजस्व की हानि हो रही है, बल्कि आम जनता और सिस्टम के बीच एक गलत संदेश जा रहा है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर प्रशासन इन चेहरों के सामने नतमस्तक क्यों है? क्यों हर बार इन मुट्ठी भर लोगों को कानून हाथ में लेने की खुली छूट दे दी जाती है? यदि आज इन पर लगाम नहीं कसी गई, तो कल को कोई भी संगठन सड़कों पर उतरकर व्यवस्था को ठप कर देगा। प्रशासन की यह चुप्पी और किसान यूनियन के नाम पर चल रहा यह ‘टोल-खेल’ अब सीधे तौर पर आम नागरिकों और कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।











