हर्षिल का राजा कहिए,पहाड़ी विल्सन या शिकारी विल्सन…. फ्रेडरिक विल्सन को लोग इसी नाम से जानते थे। आप सोच रहे होंगे कि आखिर हम इस शख्स की चर्चा पहली लाइन में ही क्यों करने लगे? क्योंकि पिछले हफ्ते यानी 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा के पीछे इस व्यक्ति का सबसे बड़ा हाथ है। आप फिर पूछेंगे वो कैसे? वो ऐसे कि धराली में उस दोपहर सेकेंडों में आया वो जलजला कोई एक दिन या कहें अचानक नहीं भड़का,उसके पीछे फ्रेडरिक विल्सन की सनक ही थी। उसने धीरे-धीरे धराली को ऐसा बर्बाद किया कि उसका परिणाम उस दिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने देखा। आइए इस राजा की कहानी आपको बताते हैं, साथ यह भी बताएंगे कि आखिर ऐसा इसने ऐसा क्या किया कि धराली आपदा के लिए लोग इसे भी दोषी मान रहे हैं।
कौन है फ्रेडरिक विल्सन?
इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से जाने-माने पर्यावरणविद,लेखक और इतिहासकार डॉ.अजय सिंह रावत ने इसपर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि एक समय था जब उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र खासकर 2,000 मीटर से ऊपर की ऊंचाई वाले इलाके देवदार के पेड़ों से घने जंगल की तरह प्रतीत होते थे। तब हर एक वर्ग किलोमीटर में औसतन 400 से 500 देवदार के पेड़ हुआ करते थे। उन्होंने इसके बाद धराली की इस विनाशकारी प्राकृतिक आपदा ने हैरतअंगेज रूप से 185 साल पहले इस इलाके में आए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक फ्रेडरिक विल्सन की चर्चा की।
रावत ने बताया कि 1840 के दशक में कंपनी के कड़े नियमों से बचकर विल्सन ने गढ़वाल के सुदूर हर्सील में शरण ली थी। उन्हें वहां की अर्थव्यवस्था में क्रांति लाने का श्रेय दिया जाता है,क्योंकि विल्सन ने मुनाफा देने वाली देवदार की लकड़ी के व्यापार की शुरुआत की थी। उन्होंने बड़ी चतुराई से भागीरथी नदी में लकड़ियों के लट्ठे तैराकर उन्हें आगे भेजना शुरू किया। विल्सन ने हर्सिल में सेब की खेती भी शुरू की और वे यहां के स्थानीय जीवन में पूरी तरह घुल-मिल गए। उन्होंने एक ‘पहाड़ी’ महिला से शादी की थी। एक स्थानीय इतिहासकार ने बताया,”विल्सन की विवादास्पद लेकिन क्रांतिकारी विरासत पर अब फिर से गौर किया जा रहा है।”
इस किताब में है राजा विल्सन का जिक्र
राजगोपाल सिंह वर्मा ने फिरंगी राजा नाम से एक किताब लिखी थी। इस किताब में फ्रेडरिक विल्सन का जिक्र है। उसमें लिखा है कि शिकारी विल्सन तब मुखबा में बैठकर धराली को बर्बाद करने का हुक्म देता था। किताब में बताया गया है कि फ्रेडरिक विल्सन की नजर धराली के देवदार के वृक्षों पर थी। उत्तरकाशी के धरासू में भी उस वक्त पेड़ों का कटाई चल ही थी। इसी के साथ धराली में भी देवदार के पेड़ों की कटाई भोर सवेरे से शुरू हो गई थी। धराली में दिन ढलने तक पैनी आरियां चलने की आवाजें आती थीं। सुनकर मानो लगता था कि कोई पर्वतों का सीना चीर रहा हो। ये जगहें विल्सन के बंगले मुखबा से अधिक दूर भी नहीं थीं। उसे प्रकृति के दोहन की कोई परवाह नहीं थी। वो पहाड़ी पर स्थित अपने घर के बारामदे से बैठकर मन ही मन खूब खुश होता था।
पंडित की भी नहीं मानी बात,दिखाया रौब
1850 का दशक ऐसा समय था,जब भारत में रेलवे की शुरुआत होने वाली थी। फ्रेडरिक विल्सन ने देखा कि रेलवे ट्रैक बनाने के लिए लकड़ी के पटरियों की बहुत जरूरत पड़ेगी। उसने टिहरी के राजा सुदर्शन शाह से जंगल से लकड़ी काटने की इजाजत ले ली। इसके बाद विल्सन ने लकड़ी की मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर देवदार के जंगल काटने शुरू कर दिए। कहा जाता है कि उसने हर्षिल,धराली, मुखबा और गंगोत्री जैसे इलाकों में 600 एकड़ से ज्यादा जमीन पर 2 लाख से ज्यादा देवदार के पेड़ काट डाले।
फिरंगी राजा’किताब में लिखा है कि विल्सन ने किसी की बात नहीं मानी। धराली और मुखबा के इलाके में एक मंदिर के पुजारी ने विल्सन को बहुत समझाया। पुजारी ने उससे कहा कि आप देवदार के पेड़ मत काटिए,लेकिन विल्सन ने साफ-साफ कह दिया कि उसके पास लकड़ी काटने का ठेका है। विल्सन ने यह भी कहा कि वह जो भी कर रहा है,कानून के हिसाब से कर रहा है। उसने यह भी रौब दिखाया कि वह ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम कर रहा है और यह सब टिहरी के राजा की इजाजत से हो रहा है। विल्सन ने पुजारी की बात को यह कहकर टाल दिया कि इसमें देवदार के प्रकोप वाली कोई बात नहीं है।
देवदार के नीचे ही दफ्न है फ्रेडरिक
विल्सन ने 1857 में देवदार के पेड़ों की कटाई कर अकूत संपत्ति कमा ली। उसे बाद में फिरंगी राजा का तमगा मिल गया। टिहरी गढ़वाल,खासकर हर्षिल और आसपास के इलाकों में उसके किस्से लोगों की जुबां पर चढ़ गए। कहा जाता है कि पहाड़ी रास्तों पर एक भी गलत कदम पड़ जाए तो इंसान खाई में गिर जाता है। फ्रेडरिक विल्सन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसके चरित्र पर भी सवाल उठे। उसने जानवरों के शिकार और उनके व्यापार जैसे गलत धंधों में भी हाथ डाल दिया। आखिरकार,जब उसका बुढ़ापा आया तो वह धराली और हर्षिल को छोड़कर मसूरी चला गया। विडंबना देखिए,उसे मसूरी में एक देवदार के पेड़ के नीचे ही दफनाया गया।










