सरकारी कर्मचारियों के लिए 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उम्मीद थी कि सरकार जल्दी ही इसके गठन और सिफारिशों को लेकर घोषणा करेगी, लेकिन यह प्रक्रिया अब तक अटकती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, आयोग की घोषणा में तीन प्रमुख वजहें हैं, जिनकी वजह से सारा मामला खिंचता चला जा रहा है।
अभी तक तैयार नहीं हुआ ToR
वेतन आयोग बनाने का मतलब सिर्फ एक घोषणा करना नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना है। आयोग के लिए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करनी होती है। इसके साथ ही आयोग के कामकाज को तय करने के लिए “Term of Reference (ToR)” यानी कार्य-परिधि तैयार करना पड़ता है। सरकार अभी तक ToR को अंतिम रूप नहीं दे पाई है, जिसके चलते आयोग की आधिकारिक शुरुआत अटकी हुई है।
बजट पर बढ़ता बोझ
किसी भी वेतन आयोग की सिफारिशें सरकार की आर्थिक नीति और राजकोषीय संतुलन पर बड़ा असर डालती हैं। 7वें वेतन आयोग के बाद भी सरकारी खजाने पर हज़ारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा था। अब जब देश की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रही है, सरकार फिलहाल कोई ऐसा बड़ा कदम उठाने से बच रही है, जिससे वित्तीय स्थिति पर और दबाव आए। यही कारण है कि 8वें वेतन आयोग की दिशा में ठोस बजटीय प्रावधान अभी नहीं किए गए हैं।
नया सैलरी स्ट्रक्चर अभी नहीं हुआ पूरी तरह से तैयार
आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है मौजूदा वेतन संरचना का अध्ययन करके नया स्ट्रक्चर तैयार करना। इसमें बेसिक पे, ग्रेड पे, भत्ते और पेंशन सिस्टम तक में बदलाव करना पड़ता है। सरकार ने कर्मचारियों और यूनियनों से इनपुट लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन यह अभी शुरुआती दौर में है। अलग-अलग वर्गों, विभागों और हितधारकों की मांगों को ध्यान में रखकर एक ऐसा मॉडल तैयार करना जो व्यवहारिक भी हो और राजकोष पर ज़्यादा बोझ भी न डाले, आसान काम नहीं है।
जैसे- जैसे साल 2025 खत्म हो रहा है, कर्मचारियों का धैर्य लगातार टूटता दिखाई दे रहा है। उन्हें भरोसा था कि यह आयोग समय रहते बन जाएगा और 2026 तक उनकी सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव लागू हो जाएगा। लेकिन मौजूदा हालात देखकर लगता है कि यह प्रक्रिया और लंबी खिंच सकती है।










