कभी एक धर्मशाला और 4-5 दुकानें थीं, कैसे 40 साल में धराली धराशायी हो गया? जानिए

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गंगोत्री हाईवे पर धराली बाजार को बसे अभी 40 साल ही हुए थे। इससे पहले यहां एक धर्मशाला और पांच छोटी दुकानें ही थीं। पांच अगस्त को कुदरत का कहर इस पूरे बाजार को पलभर में तबाह कर गया। यहां तीन मंजिला होटल, रेस्टोरेंट और रिजॉर्ट सब सैलाब में समा गए, जहां पर चार दशक पुराना बाजार था, अब चारों ओर मलबा पटा हुआ है।

40 साल पहले थी बस एक धर्मशाला

धराली गांव के जयभगवान सिंह पंवार ने बताया कि धराली में 1985 तक एक धर्मशाला थी, जो जयपुर वालों की थी। इसके अलावा चार-पांच दुकानें थीं, तब चारधाम यात्री इसी धर्मशाला में ठहरते थे। धराली पौराणिककाल से यात्रियों का ठहराव स्थान रहा है। 1985 में धराली में आग लगी, धर्मशाला और दुकानें जलकर राख हो गई, इसके बाद खीरगंगा के दूसरी तरफ नया बाजार बसना शुरू हुआ। 1991 तक यहां तीन होटल बने। इसके बाद लगातार होटल बनते रहे, यहां 50 से ज्यादा बड़े होटल थे। कई होम स्टे और रिजॉर्ट भी थे, सब सैलाब में तबाह हो गए।

धराली में पहले तीन मंदिर थे। विश्वनाथ पूर्व सैनिक कल्याण समिति के संरक्षक मेजर आरएस जमनाल (सेनि.) ने बताया कि धराली में पहले भी बाढ़ आई थी। जिस स्थान पर कल्प केदार मंदिर था, वहां पर तीन मंदिर हुआ करते थे, जिसमें दो बह गए थे। कल्प केदार मंदिर का सिर्फ कलश दिखता था, फिर से इसका जीर्णोद्वार किया गया।

275 साल बाद भी नहीं लिया सबक

गढ़वाल विवि में भू विज्ञान विभाग में विभागाध्यक्ष प्रो एमपीएस बिष्ट का कहना है कि उत्तरकाशी में जिस स्थान पर वर्तमान की घटना सामने आई उसके आसपास ही 1750 में भी भारी बाढ़ आई थी। तब बाढ़ में तीन गांव पूरी तरह नष्ट हो गए थे। 275 साल के इस सफर में बाद में भी कई बार भारी बारिश ने लोगों को चेताया लेकिन नदी के किनारे निर्माण कार्य नियंत्रित नहीं हो पाए।

2013 में भी खीर गंगा ने चेताया था

उत्तरकाशी के धराली में 2013 में भी खीर गंगा ने अपना रौद्र रूप दिखाया था, तब नदी का जलस्तर बढ़ने से यहां कुछ नुकसान भी हुआ था, कुछ घर और दुकानों में मलबा घुस गया था, बावजूद भविष्य के खतरे पर मंथन नहीं किया गया। जयभगवान सिंह पंवार का कहना है कि पहाड़ों में निर्माण के मानक तय होने चाहिए, सुरक्षित स्थानों पर मानकों के अनुरूप बसावट होनी चाहिए, तभी हम धराली जैसी आपदाओं से बच सकते हैं।

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