जंगलों में बढ़ता पर्यटन और अत्यधिक मानवीय दखल से बाघों की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ने लगा है। अत्यधिक तनाव के कारण बाघिनें कमजोर शावकों को जन्म दे रही हैं। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह तथ्य सामने आए हैं।
उत्तराखंड के कार्बेट सहित देश के पांच टाइगर रिजर्व में किए गए शोध के बाद सामने आया है कि इन क्षेत्रों में बफर के साथ कोर जोन में भी मानवीय दखल के कारण बाघ तनाव में हैं। इससे बाघों में शिकार की आदत भी बदल रही है। अमूमन तड़के, शाम और रात को शिकार करने वाले बाघ अब सुबह-शाम पर्यटन गतिविधियों की वजह से शिकार कम कर रहे हैं। वे या तो रात में या दोपहर में आराम के बीच मौका लगने पर शिकार कर रहे हैं।
बाघों के 610 नमूने लिए गए
इसके अलावा से वे ज्यादा हिंसक हो रहे हैं। अपनी टेरिटरी (क्षेत्र) तेजी से बदल रहे हैं जबकि बाघ जीवन भर लगभग एक ही टेरिटरी में रहना पसंद करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार पर्यटन मार्गों और मानव गतिविधियों के करीब रहने वाले बाघों में तनाव हार्मोन का स्तर लगातार बढ़ा मिला। इसके लिए बाघों के मल के 610 नमूनों की जांच की गई।
पर्यटन वाले इलाकों के बाघ ज्यादा प्रभावित
वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन इलाकों में पर्यटन और मानव गतिविधियां ज्यादा थी, वहां बाघों में तनाव का स्तर अधिक था। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिक डॉ. जी उमापथि के अनुसार, बाघिनें सामान्यत: शांत और सुरक्षित जंगलों में प्रजनन करना पसंद करती हैं। अब जंगलों में ऐसे शांत क्षेत्र तेजी से कम हो रहे हैं। तनाव के कारण न केवल बाघिनों की प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है, बल्कि शावकों का विकास भी कमजोर हो रहा है।
यहां हुआ शोध
यह शोध उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व, मध्य प्रदेश के कान्हा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व तथा केरल के पेरियार टाइगर रिजर्व में किया गया। वैज्ञानिकों ने इन पांच प्रमुख टाइगर रिजर्व में बाघों के व्यवहार, तनाव और प्रजनन क्षमता पर पर्यटन और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव का अध्ययन किया।
नियंत्रित पर्यटन की सलाह
वैज्ञानिकों के अनुसार यदि जंगलों में पर्यटन नियंत्रित नहीं हुआ तो बाघों के संरक्षण प्रयासों पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने कोर जोन को प्रतिबंधित करने, सफारी वाहनों घ, प्रजनन क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की सलाह दी है।









