उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर काबू पाने को वन विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। विभाग ने 13 गुलदारों व तीन भालुओं को मारने के आदेश जारी किए हैं। हालांकि अब तक केवल एक गुलदार को पौड़ी में मारा जा सका है।
उत्तराखंड में सात महीनों में 118 खतरनाक वन्यजीव चिह्नित किए गए। इनमें 90 गुलदार, 21 बाघ और आठ भालू शामिल हैं। इनमें बाघों को पकड़ने के निर्देश दिए गए हैं। वन अधिकारियों के अनुसार, ये वे वन्यजीव हैं जो बार-बार आबादी वाले क्षेत्रों में घुसकर मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बने। साथ ही कई मामलों में उक्त जानवर, जानलेवा हमलों में शामिल रहे। विभाग का कहना है कि किसी भी वन्यजीव को मारने का फैसला अंतिम विकल्प के रूप में ही लिया जाता है, जब उसे पकड़ने या खदेड़ने के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। इसके लिए चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से अनुमति ली जाती है।
बढ़ते संघर्ष ने बढ़ाई चिंता
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में गुलदार, बाघ और भालुओं की आबादी के साथ उनका मानव बस्तियों की ओर रुख बढ़ा है। इससे हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं और जनहानि भी हुई है। वन विभाग का मानना है कि सख्त कार्रवाई से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी।
बाघ-गुलदार के हमलों में कब कितनों ने जान गंवाई
आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में पिछले एक दशक में बाघ और गुलदार के हमलों में लगातार लोगों की जान गई है। वर्ष 2015 में बाघ के हमलों में 2 और गुलदार के हमलों में 26 लोगों की मौत हुई। 2016 में यह संख्या क्रमशः 4 और 23, 2017 में 7 और 9, 2018 में 6 और 15, 2019 में 3 और 18 तथा 2020 में 1 और 30 रही। इसके बाद 2021 में बाघ के हमलों में 2 और गुलदार के हमलों में 23, 2022 में 16 और 22, 2023 में 17 और 18, 2024 में 12 और 15 तथा 2025 में 12 और 18 लोगों की मौत दर्ज की गई। वहीं, वर्ष 2026 में अब तक बाघ के हमलों में 12 और गुलदार के हमलों में 16 लोगों की जान जा चुकी है।
दस साल में 327 मौतें
बीते एक दशक में वन्यजीव हमलों में 327 लोग जान गंवा चुके हैं। आंकड़े बताते हैं कि हमलों में गुलदार सबसे आगे हैं,जबकि बाघों के हमले भी बीते वर्षों में तेजी से बढ़े हैं।










