घटना छह अगस्त 2015 की है। पीड़िता अपने पति को पुलिस हिरासत से छुड़ाने की गुहार लेकर देवबंद थाने पहुंची थी। महिला से गैंगरेप के मामले में दोषी पाए गए दो पुलिसकर्मियों को अदालत ने 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
पति को पुलिस हिरासत से छुड़ाने की उम्मीद लेकर सहारनपुर के देवबंद थाने पहुंची महिला से गैंगरेप के मामले में दोषी पाए गए दो पुलिसकर्मियों को अदालत ने 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत के इस फैसले से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। पीड़ित महिला ने पूरे 11 साल तक इंसाफ की लड़ाई लड़ी। फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वितीय के न्यायाधीश प्रबोध कुमार वर्मा की कोर्ट ने शुक्रवार को तत्कालीन थाना प्रभारी रहे सेवानिवृत्त सीओ बृजमोहन यादव और तत्कालीन एसएसआई और वर्तमान में इंस्पेक्टर वेदपाल सिंह उर्फ वेगपाल सिंह को सजा सुनाते हुए प्रत्येक पर एक लाख रुपये अर्थदंड भी लगाया है। अदालत ने दोनों पर धमकी देने के मामले में पांच-पांच साल के साधारण कारावास और 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। दोनों मामलों में सजाएं साथ चलेंगी।
घटना छह अगस्त 2015 की है। पीड़िता अपने पति को पुलिस हिरासत से छुड़ाने की गुहार लेकर देवबंद थाने पहुंची थी। आरोप था कि तत्कालीन थाना प्रभारी के सरकारी आवास पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। पीड़िता ने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सात नवंबर 2017 को हाईकोर्ट के आदेश पर चार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने सजा सुनाई। दोनों को जेल भेज दिया गया। बृजमोहन सीओ पद से रिटायर हैं, वेगपाल की तैनाती फिरोजाबाद में बताई गई है।
एक-एक लाख का जुर्माना पीड़िता को मिलेगी धनराशि
अदालत के आदेश के अनुसार, सामूहिक दुष्कर्म के मामले में लगाया गए एक-एक लाख रुपये के जुर्माने की रकम पीड़िता को दी जाएगी। वहीं, धमकी देने के मामले में लगाए गए जुर्माने की 75 प्रतिशत धनराशि पीड़िता को मिलेगी। शेष धनराशि राजकोष में जमा की जाएगी। जुर्माना अदा नहीं करने पर दोनों दोषियों को अतिरिक्त कारावास भी भुगतना होगा।
11 साल इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ती रही पीड़िता
देवबंद थाने में महिला से सामूहिक दुष्कर्म और उसे धमकी देने के मामले में सजा सुनाते हुए अदालत ने दोषियों पर कारावास और अर्थदंड के साथ पीड़िता को आर्थिक प्रतिकर देने का भी आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामूहिक दुष्कर्म के मामले में धारा 376डी के तहत लगाए गए जुर्माने की पूरी धनराशि पीड़िता को दी जाएगी। वहीं, भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत लगाए गए जुर्माने की 75 प्रतिशत धनराशि पीड़िता को प्रदान की जाएगी। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए दोषियों से वसूल की जाने वाली प्रतिकर राशि पीड़िता की पहचान सुनिश्चित करने के बाद उसे देने का निर्देश दिया है। यह धनराशि अपीलीय अवधि समाप्त होने के बाद देय होगी।
न्याय की उम्मीद में अदालत की चौखट पर पहुंची पीड़िता को इंसाफ के लिए 11 साल से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान मुकदमे में 500 से ज्यादा तारीखें पड़ीं। आठ गवाहों के बयान दर्ज हुए। तारीख पर तारीख के बीच पीड़िता और उसका परिवार कानूनी लड़ाई लड़ता रहा। आखिरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वितीय ने दो आरोपियों को दोषी करार दिया।
पीड़िता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता राजीव तोमर के मुताबिक, घटना के बाद पीड़िता ने सबसे पहले स्थानीय पुलिस से न्याय की गुहार लगाई। थाने से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक शिकायत की लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। 30 नवंबर 2015 को तत्कालीन एसएसपी को रजिस्टर्ड डाक से शिकायत भेजी गई। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। पीड़िता ने इसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब तीन साल तक संघर्ष करने के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर 2017 में मुकदमा दर्ज हुआ। इसके बाद जांच और अदालत की प्रक्रिया शुरू हुई। सीबीसीआईडी की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद पीड़िता ने उसे चुनौती दी। प्रोटेस्ट पिटीशन और परिवाद के माध्यम से कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाई। अधिवक्ताओं के अनुसार, मामले में आठ गवाहों के बयान दर्ज हुए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में 500 से अधिक तारीखें पड़ीं। करीब 11 साल तीन महीने तक चले इस संघर्ष का अंत दोषसिद्धि के फैसले के रूप में सामने आया। यह फैसला केवल दो आरोपियों के दोषी ठहराए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़िता के लंबे इंतजार की कहानी भी है, जिसने अदालत में अपनी लड़ाई जारी रखी।
पैरवी के बीच हमले और पांच से अधिक मुकदमे
पीड़िता और उसके परिवार को कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। पीड़िता के अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि मुकदमे की पैरवी के दौरान परिवार पर दबाव बनाया गया। परिवार के सदस्यों के साथ करीब दस बार हमले और मारपीट की घटनाएं हुईं। परिवार के खिलाफ पांच से अधिक मुकदमे भी दर्ज किए गए। अधिवक्ताओं का कहना है कि इन परिस्थितियों के बावजूद पीड़िता ने कानूनी लड़ाई जारी रखी। पीड़िता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता राजीव तोमर और जपनीत सिंह छाबड़ा के मुताबिक, घटना के बाद से ही पीड़िता और उसके पति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
हमले के डर से सहमा परिवार, अफसरों के नहीं उठे फोन
पूर्व में हुए हमलों और लगातार दर्ज मुकदमों से डरा पीड़ित परिवार शुक्रवार को अदालत पहुंचने के लिए भी सुरक्षा को लेकर परेशान रहा। अनहोनी की आशंका के चलते परिवार ने पुलिस अधिकारियों से फोन पर सुरक्षा मांगी, लेकिन आरोप है कि कई बार कॉल करने के बावजूद किसी अधिकारी ने फोन नहीं उठाया। आखिरकार परिवार को रास्ता बदलकर चोरी-छिपे सहारनपुर कचहरी पहुंचना पड़ा। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, शुक्रवार सुबह 8:53 बजे देवबंद कोतवाली के सीयूजी नंबर पर तीन बार कॉल की गई। शुरुआत में फोन नहीं उठा और बाद में नंबर ब्लॉक कर दिया गया।










